देवी चालीसा संग्रह | Unique Devi Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱

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देवी चालीसा संग्रह   Unique Devi Chalisa Collection @  🔱 VrandAstrA 🔱 दे वी चालीसा संग्रह : भक्ति और धर्म के प्रचारक परिचय: देवी-देवताओं की पूजा हमारे संस्कार और संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। भारतीय जीवन में देवियों की उपासना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वे हमारे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की दूत होती हैं। भक्ति और धर्म का संगम, " देव चालीसा संग्रह " एवं " देवी चालीसा संग्रह ", भारतीय जीवन के एक महत्वपूर्ण अंग को दर्शाता है। खण्ड 1: देवी चालीसा संग्रह का महत्व: देवी चालीसा संग्रह का महत्व बहुत अधिक है।  यह हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है जो हमें दिव्यता की ओर ले जाता है। इसका पाठ करना हमारी मनोदशा को शुद्ध, सकारात्मक और शांत बनाता है जो हमें अपने दैनिक जीवन में उन्नति और सफलता प्रदान करता है। इनका पाठ करना हमें शक्ति और उत्साह प्रदान करता है जो हमें अपनी मनोदशा को संतुलित रखने में मदद करता है। इससे हमें आत्मविश्वास मिलता है और हम अपने लक्ष्यों के प्रति उत्सुकता से निरंतर काम करते रहते हैं। देवी चालीसा संग्रह में शामिल देवताओं...

श्री गणेश जी (सम्पूर्ण कथा) || ॐ गं गणपतए नमः || 🔱 VrandAstrA 🔱

श्री गणेश जी (सम्पूर्ण कथा)
|| ॐ गं गणपतए नमः ||
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परिचय 

श्री गणेश जी (सम्पूर्ण कथा) || ॐ गं गणपतए नमः || 🔱 VrandAstrA 🔱

श्री गणेश

भगवान गणेश, देवों के देव महादेव, भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे छोटे पुत्र हैं। भगवान गणेश की पत्नी का नाम रिद्धि और सिद्धि है। रिद्धि और सिद्धि भगवान विश्वकर्मा की पुत्रियां हैं। 

भगवन गणेश का नाम हिंदू धर्म में किसी भी शुभ कार्य करने से पहले लिया जाता है।

श्री गणेश

(नई शुरुआत, समृद्धि, बुद्धि और सफलता के देवता और जीवन से बाधाओं को दूर करने वाले भगवान)

मन्त्र 

ॐ वक्रतुंडाय विद्महे एकदंताय धिमहि तन्नो ददंती प्रचोद्यात , 

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः निर्विघ्नं कुरु में देव सर्वे कार्येषुसर्वदा:

अन्य नाम

गणपति, विनायक, गजानन, गणेश्वर, गौरीनंदन, गौरीपुत्र, श्री गणेश, गणधिपति, सिद्धिविनायक, अष्टविनायक, बुद्धिपति, शुभकर्ता, सुखकर्ता, विघ्नहर्ता,‌‌महागणपति। 

द्वादश नामावली

गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन। 

उपरोक्त द्वादश नाम नारद पुराण में पहली बार गणेश के द्वादश नामावली में आया है। विद्यारम्भ तथा विवाह के पूजन के प्रथम में इन नामो से गणपति की अराधना का विधान है।

अस्त्र

त्रिशूल, तलवार, अंकुश, पाश, मोदक और परशु

प्रतीक

स्वास्तिक और मोदक

दिवस

बुधवार

जीवनसाथी

रिद्धि,सिद्धि और बुद्धि

माता-पिता

भगवान शंकर (पिता)

देवी पार्वती (माता)

भाई-बहन

भगवान कार्तिकेय (बड़े भाई) , भगवान अय्यपा (बड़े भाई) , देवी अशोकसुन्दरी (बड़ी बहन) , देवी ज्योति (बड़ी बहन) और मनसा देवी (बड़ी बहन)

संतान

शुभ (बड़ा बेटा "शुभता का प्रतीक"), लाभ (छोटा बेटा "लाभ का प्रतीक"), और मां संतोषी (बेटी "संतुष्टि की देवी")

सवारी

मूषक (चूहा)

शास्त्र

गणेश पुराण, शिव महापुराण और मुदगल पुराण

त्यौहार

गणेश चतुर्थी


शारीरिक संरचना 

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गणपति आदिदेव हैं, जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। उनकी शारीरिक संरचना में भी विशिष्टगहरा अर्थ निहित है। शिवमानस पूजा में श्री गणेश को प्रणव (ॐ) कहा गया है। इस एकाक्षर ब्रह्म में ऊपर वाला भाग गणेश का मस्तक, नीचे का भाग उदर, चंद्रबिंदु लड्डू और मात्रा सूँड है।


चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं। वे लंबोदर हैं क्योंकि समस्त चराचर सृष्टि उनके उदर में विचरती है। बड़े कान अधिक ग्राह्यशक्ति व छोटी-पैनी आँखें सूक्ष्म-तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं। उनकी लंबी नाक (सूंड) महाबुद्धित्व का प्रतीक है।


प्राचीन कथा 

श्री गणेश जी (सम्पूर्ण कथा) || ॐ गं गणपतए नमः || 🔱 VrandAstrA 🔱

प्राचीन समय में सुमेरू पर्वत पर सौभरि ऋषि का अत्यंत मनोरम आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवती और पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषि लकड़ी लेने के लिए वन में गए और मनोमयी गृह-कार्य में लग गई। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहाँ आया और उसने अनुपम लावण्यवती मनोमयी को देखा तो व्याकुल हो गया।


कौंच ने ऋषि-पत्नी का हाथ पकड़ लिया। रोती और काँपती हुई ऋषि पत्नी उससे दया की भीख माँगने लगी। उसी समय सौभरि ऋषि आ गए। उन्होंने गंधर्व को श्राप देते हुए कहा 'तूने चोर की तरह मेरी सहधर्मिणी का हाथ पकड़ा है, इस कारण तू मूषक होकर धरती के नीचे रहेगा और चोरी करके अपना पेट भरेगा।


काँपते हुए गंधर्व ने मुनि से प्रार्थना की-'दयालु मुनि, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया था। मुझे क्षमा कर दें। ऋषि ने कहा मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा, तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहाँ गणपति देव गजमुख पुत्र रूप में प्रकट होंगे (हर युग में गणेशजी ने अलग-अलग अवतार लिए) तब तू उनका डिंक नामक वाहन बन जाएगा, जिससे देवगण भी तुम्हारा सम्मान करने लगेंगे। सारे विश्व तब तुझें श्रीडिंकजी कहकर वंदन करेंगे।


गणेश को जन्म न देते हुए माता पार्वती ने उनके शरीर की रचना की। उस समय उनका मुख सामान्य था। माता पार्वती के स्नानागार में गणेश की रचना के बाद माता ने उनको घर की पहरेदारी करने का आदेश दिया। माता ने कहा कि जब तक वह स्नान कर रही हैं तब तक के लिये गणेश किसी को भी घर में प्रवेश न करने दे। तभी द्वार पर भगवान शंकर आए और बोले "पुत्र यह मेरा घर है मुझे प्रवेश करने दो।" गणेश के रोकने पर प्रभु ने गणेश का सर धड़ से अलग कर दिया। गणेश को भूमि में निर्जीव पड़ा देख माता पार्वती व्याकुल हो उठीं। तब शिव को उनकी त्रुटि का बोध हुआ और उन्होंने गणेश के धड़ पर गज का सर लगा दिया। उनको प्रथम पूज्य का वरदान मिला इसीलिए सर्वप्रथम गणेश की पूजा होती है। गणेशजी को सिन्दूर और दूब चढ़ाने से विशेष फल मिलता है। इसके अतिरिक्त उन्हें गुड़ के मोदक और बूंदी के लड्डू , शामी वृक्ष के पत्ते तथा सुपारी भी प्रिय है। गणेश जी को लाल धोती तथा हरा वस्त्र चढ़ाने का भी विधान है।




विवाह

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शास्त्रों के अनुसार, गणेश जी का विवाह भी हुआ था इनकी दो पत्नियां हैं। जिनका नाम रिद्धि और सिद्धि है तथा इनसे गणेश जी को दो पुत्र और एक पुत्री हैं जिनका नाम शुभ और लाभ नाम बताया जाता है,यही कारण है कि शुभ और लाभ ये दो शब्द आपको अक्सर उनकी मूर्ति के साथ दिखाई देते हैं तथा ये सभी जन्म और मृत्यु में आते है, गणेश जी की पूजा करने से केवल सिद्धियाँ प्राप्त होती है लेकिन इनकी भक्ति से पूर्ण मोक्ष संभव नहीं है। गणेश जी के इन दो पुत्रों के अलावा एक पुत्री भी हैं वे संतोषी माता के नाम से विख्यात हैं। दक्षिण भारतीय संस्कृति में गणेशजी ब्रह्मचारी रूप में दर्शाये गये हैं।



ज्योतिष शास्त्रानुसार

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ज्योतिष्शास्त्र के अनुसार, गणेशजी को केतु के रूप में जाना जाता है। केतु एक छाया ग्रह है, जो राहु नामक छाया ग्रह से हमेशा विरोध में रहता है, बिना विरोध के ज्ञान नहीं आता है और बिना ज्ञान के मुक्ति नहीं है। गणेशजी को मानने वालों का मुख्य प्रयोजन उनको सर्वत्र देखना है, गणेश अगर साधन है तो संसार के प्रत्येक कण में वह विद्यमान है। उदाहरण के लिये तो जो साधन है वही गणेश है, जीवन को चलाने के लिये अनाज की आवश्यकता होती है, जीवन को चलाने का साधन अनाज है, तो अनाज गणेश है। अनाज को पैदा करने के लिये किसान की आवश्यकता होती है, तो किसान गणेश है। किसान को अनाज बोने और निकालने के लिये बैलों की आवश्यक्ता होती है तो बैल भी गणेश है। अनाज बोने के लिये खेत की आवश्यक्ता होती है, तो खेत गणेश है। अनाज को रखने के लिये भण्डारण स्थान की आवश्यक्ता होती है तो भण्डारण का स्थान भी गणेश है। अनाज के घर में आने के बाद उसे पीसने के लिए चक्की की आवश्यक्ता होती है तो चक्की भी गणेश है। चक्की से निकालकर रोटी बनाने के लिये तवे, चीमटे और रोटी बनाने वाले की आवश्यक्ता होती है, तो यह सभी गणेश है। खाने के लिये हाथों की आवश्यक्ता होती है, तो हाथ भी गणेश है। मुँह में खाने के लिये दाँतों की आवश्यक्ता होती है, तो दाँत भी गणेश है। कहने के लिये जो भी साधन जीवन में प्रयोग किये जाते वे सभी गणेश है, अकेले शंकर पार्वती के पुत्र और देवता ही नहीं।


श्री गणेश चालीसा 

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जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल।

विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥


जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥

ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥

गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिर लाए॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

 

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।

नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥

सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥


श्री गणेश आरती

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जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।


एकदंत, दयावंत, चार भुजाधारी।

मस्तक सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी।

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पान चढ़ें, फूल चढ़ें और चढ़ें मेवा

लड्डुअन  का भोग लगे, संत करें  सेवा


जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।


अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया

बांझन  को पुत्र देत, निर्धन को माया ।।

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दीनन की लाज राखो, शम्भु-सुत वारी ।

कामना को पूर्ण करो, जग  बलिहारी ।।


जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे  सेवा । माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।


जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।

जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ।।


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