देवी चालीसा संग्रह | Unique Devi Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱

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देवी चालीसा संग्रह   Unique Devi Chalisa Collection @  🔱 VrandAstrA 🔱 दे वी चालीसा संग्रह : भक्ति और धर्म के प्रचारक परिचय: देवी-देवताओं की पूजा हमारे संस्कार और संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं। भारतीय जीवन में देवियों की उपासना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वे हमारे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति की दूत होती हैं। भक्ति और धर्म का संगम, " देव चालीसा संग्रह " एवं " देवी चालीसा संग्रह ", भारतीय जीवन के एक महत्वपूर्ण अंग को दर्शाता है। खण्ड 1: देवी चालीसा संग्रह का महत्व: देवी चालीसा संग्रह का महत्व बहुत अधिक है।  यह हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है जो हमें दिव्यता की ओर ले जाता है। इसका पाठ करना हमारी मनोदशा को शुद्ध, सकारात्मक और शांत बनाता है जो हमें अपने दैनिक जीवन में उन्नति और सफलता प्रदान करता है। इनका पाठ करना हमें शक्ति और उत्साह प्रदान करता है जो हमें अपनी मनोदशा को संतुलित रखने में मदद करता है। इससे हमें आत्मविश्वास मिलता है और हम अपने लक्ष्यों के प्रति उत्सुकता से निरंतर काम करते रहते हैं। देवी चालीसा संग्रह में शामिल देवताओं...

देव चालीसा संग्रह | Unique Dev Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱

 देव चालीसा संग्रह 

Unique Dev Chalisa Collection  @

🔱 VrandAstrA 🔱



देव चालीसा संग्रह | Unique Dev Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱


देव चालीसा संग्रह :


भक्ति और धर्म के प्रचारक


परिचय:


देवी-देवताओं की पूजा हमारे संस्कार और संस्कृति का एक अभिन्न अंग हैं।

भारतीय जीवन में देवों की उपासना एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। वे हमारे जीवन में सुख, समृद्धि और शांति के दूत होते हैं। भक्ति और धर्म का संगम, "देव चालीसा संग्रह" एवं "देवी चालीसा संग्रह" भारतीय जीवन के एक महत्वपूर्ण अंग को दर्शाता है।

देव चालीसा संग्रह | Unique Dev Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱


खण्ड 1:


देव चालीसा संग्रह का महत्व:


देव चालीसा संग्रह का महत्व बहुत अधिक है। 

यह हमारे धार्मिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है जो हमें दिव्यता की ओर ले जाता है। इसका पाठ करना हमारी मनोदशा को शुद्ध, सकारात्मक और शांत बनाता है जो हमें अपने दैनिक जीवन में उन्नति और सफलता प्रदान करता है।

इनका पाठ करना हमें शक्ति और उत्साह प्रदान करता है जो हमें अपनी मनोदशा को संतुलित रखने में मदद करता है। इससे हमें आत्मविश्वास मिलता है और हम अपने लक्ष्यों के प्रति उत्सुकता से निरंतर काम करते रहते हैं।

देव चालीसा संग्रह में शामिल देवताओं की कई गुणवत्ताएं होती हैं जो हमें उनसे सीखने को मिलती हैं। ये गुणवत्ताएं हमें समाधान, सहनशीलता, उदारता, निष्ठा, धैर्य, त्याग, और संकट के समय में स्थिरता आदि सिखाती हैं।


अंततः, देव चालीसा संग्रह का पाठ करना हमारे जीवन में एक सकारात्मक बदलाव लाता है। यह हमारे अंतरंग और बाहरी जीवन, दोनों पर प्रभाव डालता है। इससे हमें दिव्य और सच्चे जीवन की ओर जाने की प्रेरणा मिलती है। 

अतिरिक्त रूप से, इनके पाठ से हम दुःख, रोग, संकट और दुर्भाग्य को दूर करने की आशा करते हैं। यह हमें आशा दिलाता है कि हमें संकट के समय अपने आस-पास कुछ दिव्य शक्तियों का सहारा लेना चाहिए।

इसलिए, देव चालीसा संग्रह धार्मिक और आध्यात्मिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है, जो हमें सद्गुणों से सम्पन्न और देवताओं की कृपा से संपूर्ण बनाता है।


खण्ड 2 :


देव चालीसा संग्रह की कुछ मुख्य विशेषताएं: 


देव चालीसा संग्रह की कुछ मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:


आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण:  यह संग्रह एक धार्मिक लेख है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए महत्वपूर्ण है। इसमें विभिन्न देवताओं के नाम और उनकी महिमा वर्णित है।


दिव्यता को बढ़ावा देने वाला:  यह संग्रह हमें दिव्यता को समझने और उसे बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है। इसके अलावा, यह हमें दिव्य शक्तियों और कृपाओं के लिए प्रार्थना करने की सलाह भी देता है।


संकटों से निजात प्रदान करता है:  इस संग्रह का पाठ करने से जीवन में उत्पन्न होने वाले संकटों से मुक्ति प्राप्त होता है।


सुख-शांति और समृद्धि के लिए उपयोगी:  इस संग्रह के पाठ से सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है।


संस्कृति और भारतीय धर्म के प्रति आकर्षण बढ़ाता है: देव चालीसा संग्रह, भारतीय धर्म और संस्कृति का महत्त्वपूर्ण भाग है।


खण्ड 3:


विभिन्न देवों के चालीसा



श्री गणेश चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️

जय गणपति सद्गुण सदन कविवर बदन कृपाल।

विघ्न हरण मंगल करण जय जय गिरिजालाल॥


🔱 चौपाई🔱

जय जय जय गणपति राजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजित मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विधाता॥

ऋद्धि सिद्धि तव चँवर डुलावे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगल कारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा।

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहु विधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनि जन सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आए शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

गिरजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास उमा कर भयऊ। शनि सों बालक देखन कह्यऊ॥

पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक शिर उड़ि गयो आकाशा॥

गिरजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्ह्यों लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाए। काटि चक्र सो गज शिर लाए॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रची बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुं कौन बिधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। लख प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

⚜️ दोहा⚜️ 

श्री गणेश यह चालीसा पाठ करें धर ध्यान।

नित नव मंगल गृह बसै लहे जगत सन्मान॥

सम्वत् अपन सहस्र दश ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो मंगल मूर्ति गणेश॥



श्री राम चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं

वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं

बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्

पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं



🔱चौपाई🔱


श्री रघुबीर भक्त हितकारी ।

सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी ॥


निशि दिन ध्यान धरै जो कोई ।

ता सम भक्त और नहिं होई ॥


ध्यान धरे शिवजी मन माहीं ।

ब्रह्मा इन्द्र पार नहिं पाहीं ॥


जय जय जय रघुनाथ कृपाला ।

सदा करो सन्तन प्रतिपाला ॥


दूत तुम्हार वीर हनुमाना ।

जासु प्रभाव तिहूँ पुर जाना ॥


तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला ।

रावण मारि सुरन प्रतिपाला ॥


तुम अनाथ के नाथ गोसाईं ।

दीनन के हो सदा सहाई ॥


ब्रह्मादिक तव पार न पावैं ।

सदा ईश तुम्हरो यश गावैं ॥


चारिउ वेद भरत हैं साखी ।

तुम भक्तन की लज्जा राखी ॥


गुण गावत शारद मन माहीं ।

सुरपति ताको पार न पाहीं ॥ 10 ॥


नाम तुम्हार लेत जो कोई ।

ता सम धन्य और नहिं होई ॥


राम नाम है अपरम्पारा ।

चारिहु वेदन जाहि पुकारा ॥


गणपति नाम तुम्हारो लीन्हों ।

तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हों ॥


शेष रटत नित नाम तुम्हारा ।

महि को भार शीश पर धारा ॥


फूल समान रहत सो भारा ।

पावत कोउ न तुम्हरो पारा ॥


भरत नाम तुम्हरो उर धारो ।

तासों कबहुँ न रण में हारो ॥


नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा ।

सुमिरत होत शत्रु कर नाशा ॥


लषन तुम्हारे आज्ञाकारी ।

सदा करत सन्तन रखवारी ॥


ताते रण जीते नहिं कोई ।

युद्ध जुरे यमहूँ किन होई ॥


महा लक्ष्मी धर अवतारा ।

सब विधि करत पाप को छारा ॥ 20 ॥


सीता राम पुनीता गायो ।

भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो ॥


घट सों प्रकट भई सो आई ।

जाको देखत चन्द्र लजाई ॥


सो तुमरे नित पांव पलोटत ।

नवो निद्धि चरणन में लोटत ॥


सिद्धि अठारह मंगल कारी ।

सो तुम पर जावै बलिहारी ॥


औरहु जो अनेक प्रभुताई ।

सो सीतापति तुमहिं बनाई ॥


इच्छा ते कोटिन संसारा ।

रचत न लागत पल की बारा ॥


जो तुम्हरे चरनन चित लावै ।

ताको मुक्ति अवसि हो जावै ॥


सुनहु राम तुम तात हमारे ।

तुमहिं भरत कुल- पूज्य प्रचारे ॥


तुमहिं देव कुल देव हमारे ।

तुम गुरु देव प्राण के प्यारे ॥


जो कुछ हो सो तुमहीं राजा ।

जय जय जय प्रभु राखो लाजा ॥ 30 ॥


रामा आत्मा पोषण हारे ।

जय जय जय दशरथ के प्यारे ॥


जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरूपा ।

निगुण ब्रह्म अखण्ड अनूपा ॥


सत्य सत्य जय सत्य- ब्रत स्वामी ।

सत्य सनातन अन्तर्यामी ॥


सत्य भजन तुम्हरो जो गावै ।

सो निश्चय चारों फल पावै ॥


सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं ।

तुमने भक्तहिं सब सिद्धि दीन्हीं ॥


ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरूपा ।

नमो नमो जय जापति भूपा ॥


धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा ।

नाम तुम्हार हरत संतापा ॥


सत्य शुद्ध देवन मुख गाया ।

बजी दुन्दुभी शंख बजाया ॥


सत्य सत्य तुम सत्य सनातन ।

तुमहीं हो हमरे तन मन धन ॥


याको पाठ करे जो कोई ।

ज्ञान प्रकट ताके उर होई ॥ 40 ॥


आवागमन मिटै तिहि केरा ।

सत्य वचन माने शिव मेरा ॥


और आस मन में जो ल्यावै ।

तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै ॥


साग पत्र सो भोग लगावै ।

सो नर सकल सिद्धता पावै ॥


अन्त समय रघुबर पुर जाई ।

जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई ॥


श्री हरि दास कहै अरु गावै ।

सो वैकुण्ठ धाम को पावै ॥



 ⚜️दोहा⚜️


सात दिवस जो नेम कर पाठ करे चित लाय ।

हरिदास हरिकृपा से अवसि भक्ति को पाय ॥


राम चालीसा जो पढ़े रामचरण चित लाय ।

जो इच्छा मन में करै सकल सिद्ध हो जाय ।। 



श्री हनुमान चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुर सुधार ।

वर्णौ रघुवर विमल यश जो दायक फल चार ।।

बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार ।

बल बुधि विद्या देहु मोहि, हरहु क्लेश विकार ।।


🔱 चौपाई 🔱


जय हनुमान ज्ञान गुन सागर

जय कपीस तिहुँ लोक उजागर

राम दूत अतुलित बल धामा

अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ॥१॥


महावीर विक्रम बजरंगी

कुमति निवार सुमति के संगी

कंचन बरन बिराज सुबेसा

कानन कुंडल कुँचित केसा ॥२॥


हाथ बज्र अरु ध्वजा बिराजे

काँधे मूँज जनेऊ साजे

शंकर स्वंय केशरी नंदन

तेज प्रताप महा जगवंदन ॥३॥


विद्यावान गुनी अति चातुर

राम काज करिबे को आतुर

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया

राम लखन सीता मनबसिया ॥४॥


सूक्ष्म रूप धरि सियहि दिखावा

बिकट रूप धरि लंक जरावा

भीम रूप धरि असुर सँहारे

रामचंद्र के काज सवाँरे ॥५॥


लाय सजीवन लखन जियाए

श्री रघुबीर हरषि उर लाए

रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई

तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥६॥


सहस बदन तुम्हरो जस गावै

अस कहि श्रीपति कंठ लगावै

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा

नारद सारद सहित अहीसा ॥७॥


यम कुबेर दिगपाल जहाँ ते

कवि कोविद कहि सके कहाँ ते

तुम उपकार सुग्रीवहि कीन्हा

राम मिलाय राज पद दीन्हा ॥८॥


तुम्हरो मंत्र विभीषण माना

लंकेश्वर भये सब जग जाना

युग सहस्त्र योजन पर भानू

लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥९॥


प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही

जलधि लाँघि गए अचरज नाही

दुर्गम काज जगत के जेते

सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ॥१०॥


राम दुआरे तुम रखवारे

होत न आज्ञा बिनु पैसारे

सब सुख लहै तुम्हारी सरना

तुम रक्षक काहू को डरना ॥११॥


आपन तेज सम्हारो आपै

तीनों लोक हाँक ते काँपै

भूत पिशाच निकट नहि आवै

महाबीर जब नाम सुनावै ॥१२॥


नासै रोग हरे सब पीरा

जपत निरंतर हनुमत बीरा

संकट से हनुमान छुडावै

मन क्रम वचन ध्यान जो लावै ॥१३॥


सब पर राम राज सिर ताजा

तिनके काज सकल तुम साजा


और मनोरथ जो कोई लावै

सोइ अमित जीवन फल पावै ॥१४॥


चारों युग प्रताप तुम्हारा

है परसिद्ध जगत उजियारा

साधु संत के तुम रखवारे

असुर निकंदन राम दुलारे ॥१५॥


अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता

अस बर दीन जानकी माता

राम रसायन तुम्हरे पासा

सादर हो रघुपति के दासा ॥१६॥


तुम्हरे भजन राम को पावै

जनम जनम के दुख बिसरावै

अंतकाल रघुवरपुर जाई

जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥१७॥


और देवता चित्त न धरई

हनुमत सेई सर्व सुख करई

संकट कटै मिटै सब पीरा

जो सुमिरै हनुमत बलवीरा ॥१८॥


जै जै जै हनुमान गोसाईं

कृपा करहु गुरु देव की नाई

यह सत बार पाठ कर जोई

छूटहि बंदि महा सुख होई ॥१९॥


जो यह पढ़े हनुमान चालीसा

होय सिद्धि साखी गौरीसा

तुलसीदास सदा हरि चेरा

कीजै नाथ हृदय मँह डेरा ॥२०॥


⚜️दोहा⚜️


पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।

राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥



श्री शिव चालीसा 


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⚜️ दोहा⚜️


जय गणेश गिरिजा सुवन,

मंगल मूल सुजान ।

कहत अयोध्यादास तुम,

देहु अभय वरदान ॥


🔱चौपाई🔱


जय गिरिजा पति दीन दयाला ।

सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥


भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।

कानन कुण्डल नागफनी के ॥


अंग गौर शिर गंग बहाये ।

मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥


वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।

छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4


मैना मातु की हवे दुलारी ।

बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥


कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।

करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥


नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।

सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥


कार्तिक श्याम और गणराऊ ।

या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8


देवन जबहीं जाय पुकारा ।

तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥


किया उपद्रव तारक भारी ।

देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥


तुरत षडानन आप पठायउ ।

लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥


आप जलंधर असुर संहारा ।

सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12


त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।

सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥


किया तपहिं भागीरथ भारी ।

पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥


दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।

सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥


वेद नाम महिमा तव गाई।

अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16


प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।

जरत सुरासुर भए विहाला ॥


कीन्ही दया तहं करी सहाई ।

नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥


पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।

जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥


सहस कमल में हो रहे धारी ।

कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20


एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।

कमल नयन पूजन चहं सोई ॥


कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।

भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥


जय जय जय अनन्त अविनाशी ।

करत कृपा सब के घटवासी ॥


दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।

भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24


त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।

येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥


लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।

संकट से मोहि आन उबारो ॥


मात-पिता भ्राता सब होई ।

संकट में पूछत नहिं कोई ॥


स्वामी एक है आस तुम्हारी ।

आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28


धन निर्धन को देत सदा हीं ।

जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥


अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।

क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥


शंकर हो संकट के नाशन ।

मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥


योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।

शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32


नमो नमो जय नमः शिवाय ।

सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥


जो यह पाठ करे मन लाई ।

ता पर होत है शम्भु सहाई ॥


ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।

पाठ करे सो पावन हारी ॥


पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।

निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36


पण्डित त्रयोदशी को लावे ।

ध्यान पूर्वक होम करावे ॥


त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।

ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥


धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।

शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥


जन्म जन्म के पाप नसावे ।

अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40


कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।

जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥


⚜️दोहा⚜️


नित्त नेम कर प्रातः ही,

पाठ करौं चालीसा ।

तुम मेरी मनोकामना,

पूर्ण करो जगदीश ॥


मगसर छठि हेमन्त ॠतु,

संवत चौसठ जान ।

अस्तुति चालीसा शिवहि,

पूर्ण कीन कल्याण ॥



श्री कृष्ण चालीसा 


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⚜️दोहा⚜️


बंशी शोभित कर मधुर,नील जलद तन श्याम।


अरुण अधर जनु बिम्बा फल,पिताम्बर शुभ साज॥


जय मनमोहन मदन छवि,कृष्णचन्द्र महाराज।

करहु कृपा हे रवि तनय,राखहु जन की लाज॥

 

🔱चौपाई🔱

 

जय यदुनंदन जय जगवंदन।जय वसुदेव देवकी नन्दन॥

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे। जय प्रभु भक्तन के दृग तारे॥

 

जय नटनागर, नाग नथइया॥ कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो। आओ दीनन कष्ट निवारो॥

 

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ। होवे पूर्ण विनय यह मेरौ॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो। आज लाज भारत की राखो॥

 

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे। मृदु मुस्कान मोहिनी डारे॥

राजित राजिव नयन विशाला। मोर मुकुट वैजन्तीमाला॥


कुंडल श्रवण, पीत पट आछे। कटि किंकिणी काछनी काछे॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे। छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे॥

 

मस्तक तिलक, अलक घुँघराले। आओ कृष्ण बांसुरी वाले॥

करि पय पान, पूतनहि तार्यो। अका बका कागासुर मार्यो॥

 

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला। भै शीतल लखतहिं नंदलाला॥

सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई। मूसर धार वारि वर्षाई॥

 

लगत लगत व्रज चहन बहायो। गोवर्धन नख धारि बचायो॥

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई। मुख मंह चौदह भुवन दिखाई॥


दुष्ट कंस अति उधम मचायो॥ कोटि कमल जब फूल मंगायो॥

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें। चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें॥

 

करि गोपिन संग रास विलासा। सबकी पूरण करी अभिलाषा॥

केतिक महा असुर संहार्यो। कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो॥

 

मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।उग्रसेन कहँ राज दिलाई॥

महि से मृतक छहों सुत लायो। मातु देवकी शोक मिटायो॥

 

भौमासुर मुर दैत्य संहारी। लाये षट दश सहसकुमारी॥

दै भीमहिं तृण चीर सहारा। जरासिंधु राक्षस कहँ मारा॥


असुर बकासुर आदिक मार्यो। भक्तन के तब कष्ट निवार्यो॥

दीन सुदामा के दुःख टार्यो। तंदुल तीन मूंठ मुख डार्यो॥

 

प्रेम के साग विदुर घर माँगे।दर्योधन के मेवा त्यागे॥

लखी प्रेम की महिमा भारी।ऐसे श्याम दीन हितकारी॥

 

भारत के पारथ रथ हाँके।लिये चक्र कर नहिं बल थाके॥

निज गीता के ज्ञान सुनाए।भक्तन हृदय सुधा वर्षाए॥

 

मीरा थी ऐसी मतवाली।विष पी गई बजाकर ताली॥

राना भेजा साँप पिटारी।शालीग्राम बने बनवारी॥


निज माया तुम विधिहिं दिखायो।उर ते संशय सकल मिटायो॥

तब शत निन्दा करि तत्काला।जीवन मुक्त भयो शिशुपाला॥

 

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई।दीनानाथ लाज अब जाई॥

तुरतहि वसन बने नंदलाला।बढ़े चीर भै अरि मुँह काला॥

 

अस अनाथ के नाथ कन्हइया। डूबत भंवर बचावइ नइया॥

सुन्दरदास आ उर धारी।दया दृष्टि कीजै बनवारी॥

 

नाथ सकल मम कुमति निवारो।क्षमहु बेगि अपराध हमारो॥

खोलो पट अब दर्शन दीजै।बोलो कृष्ण कन्हइया की जै॥


⚜️दोहा⚜️


यह चालीसा कृष्ण का, पाठ करै उर धारि।

अष्ट सिद्धि नवनिधि फल, लहै पदारथ चारि॥



श्री शनि चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।

दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥


जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।

करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥


🔱चौपाई🔱


जयति जयति शनिदेव दयाला ।

करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥


चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।

माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥


परम विशाल मनोहर भाला ।

टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥


कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।

हिय माल मुक्तन मणि दमके ॥ ४॥


कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।

पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥


पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन ।

यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥


सौरी, मन्द, शनी, दश नामा ।

भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥


जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं ।

रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥ ८॥


पर्वतहू तृण होई निहारत ।

तृणहू को पर्वत करि डारत ॥


राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।

कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥


बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।

मातु जानकी गई चुराई ॥


लखनहिं शक्ति विकल करिडारा ।

मचिगा दल में हाहाकारा ॥ १२॥


रावण की गतिमति बौराई ।

रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥


दियो कीट करि कंचन लंका ।

बजि बजरंग बीर की डंका ॥


नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।

चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥


हार नौलखा लाग्यो चोरी ।

हाथ पैर डरवाय तोरी ॥ १६॥


भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।

तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥


विनय राग दीपक महं कीन्हयों ।

तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥


हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।

आपहुं भरे डोम घर पानी ॥


तैसे नल पर दशा सिरानी ।

भूंजीमीन कूद गई पानी ॥ २०॥


श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।

पारवती को सती कराई ॥


तनिक विलोकत ही करि रीसा ।

नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥


पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।

बची द्रौपदी होति उघारी ॥


कौरव के भी गति मति मारयो ।

युद्ध महाभारत करि डारयो ॥ २४॥


रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।

लेकर कूदि परयो पाताला ॥


शेष देवलखि विनती लाई ।

रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥


वाहन प्रभु के सात सजाना ।

जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥


जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।

सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥ २८॥


गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।

हय ते सुख सम्पति उपजावैं ॥


गर्दभ हानि करै बहु काजा ।

सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥


जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।

मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥


जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।

चोरी आदि होय डर भारी ॥ ३२॥


तैसहि चारि चरण यह नामा ।

स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥


लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।

धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥


समता ताम्र रजत शुभकारी ।

स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी ॥


जो यह शनि चरित्र नित गावै ।

कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥ ३६॥


अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।

करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥


जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।

विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥


पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।

दीप दान दै बहु सुख पावत ॥


कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।

शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥ ४०॥


⚜️ दोहा⚜️


पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।

करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥



श्री सूर्य चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,

पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥


🔱चौपाई🔱


जय सविता जय जयति दिवाकर,

सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥

भानु पतंग मरीची भास्कर,

सविता हंस सुनूर विभाकर॥ 1॥


विवस्वान आदित्य विकर्तन,

मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥

अम्बरमणि खग रवि कहलाते,

वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥ 2॥


सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,

मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥

अरुण सदृश सारथी मनोहर,

हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥3॥


मंडल की महिमा अति न्यारी,

तेज रूप केरी बलिहारी॥

उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,

देखि पुरन्दर लज्जित होते॥4


मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,

सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥

पूषा रवि आदित्य नाम लै,

हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥5॥


द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,

मस्तक बारह बार नवावैं॥

चार पदारथ जन सो पावै,

दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥6॥


नमस्कार को चमत्कार यह,

विधि हरिहर को कृपासार यह॥

सेवै भानु तुमहिं मन लाई,

अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥7॥


बारह नाम उच्चारन करते,

सहस जनम के पातक टरते॥

उपाख्यान जो करते तवजन,

रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥8॥


धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,

प्रबल मोह को फंद कटतु है॥

अर्क शीश को रक्षा करते,

रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥9॥


सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,

कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥

भानु नासिका वासकरहुनित,

भास्कर करत सदा मुखको हित॥10॥


ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,

रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥

कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,

तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥11॥


पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,

त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥

युगल हाथ पर रक्षा कारन,

भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥12॥


बसत नाभि आदित्य मनोहर,

कटिमंह, रहत मन मुदभर॥

जंघा गोपति सविता बासा,

गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥13॥


विवस्वान पद की रखवारी,

बाहर बसते नित तम हारी॥

सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,

रक्षा कवच विचित्र विचारे॥14॥


अस जोजन अपने मन माहीं,

भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥

दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,

जोजन याको मन मंह जापै॥15॥

अंधकार जग का जो हरता,

नव प्रकाश से आनन्द भरता॥


ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,

कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥

मंद सदृश सुत जग में जाके,

धर्मराज सम अद्भुत बांके॥16॥


धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,

किया करत सुरमुनि नर सेवा॥

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,

दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥17॥


परम धन्य सों नर तनधारी,

हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥

अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,

मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥18॥


भानु उदय बैसाख गिनावै,

ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥

यम भादों आश्विन हिमरेता,

कातिक होत दिवाकर नेता॥19॥


अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,

पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥20॥


⚜️दोहा⚜️


भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,

सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥



श्री विष्णु चालीसा 


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⚜️दोहा⚜️

 

विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय।

कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय।

 

🔱चौपाई🔱

 

नमो विष्णु भगवान खरारी।

कष्ट नशावन अखिल बिहारी॥

 

प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी।

त्रिभुवन फैल रही उजियारी॥

 

सुन्दर रूप मनोहर सूरत।

सरल स्वभाव मोहनी मूरत॥

 

तन पर पीतांबर अति सोहत।

बैजन्ती माला मन मोहत॥

 

शंख चक्र कर गदा बिराजे।

देखत दैत्य असुर दल भाजे॥

 

सत्य धर्म मद लोभ न गाजे।

काम क्रोध मद लोभ न छाजे॥


संतभक्त सज्जन मनरंजन।

दनुज असुर दुष्टन दल गंजन॥

 

सुख उपजाय कष्ट सब भंजन।

दोष मिटाय करत जन सज्जन॥

 

पाप काट भव सिंधु उतारण।

कष्ट नाशकर भक्त उबारण॥

 

करत अनेक रूप प्रभु धारण।

केवल आप भक्ति के कारण॥

 

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा।

तब तुम रूप राम का धारा॥

 

भार उतार असुर दल मारा।

रावण आदिक को संहारा॥


आप वराह रूप बनाया।

हरण्याक्ष को मार गिराया॥

 

धर मत्स्य तन सिंधु बनाया।

चौदह रतनन को निकलाया॥

 

अमिलख असुरन द्वंद मचाया।

रूप मोहनी आप दिखाया॥

 

देवन को अमृत पान कराया।

असुरन को छवि से बहलाया॥


कूर्म रूप धर सिंधु मझाया।

मंद्राचल गिरि तुरत उठाया॥

 

शंकर का तुम फन्द छुड़ाया।

भस्मासुर को रूप दिखाया॥

 

वेदन को जब असुर डुबाया।

कर प्रबंध उन्हें ढूंढवाया॥

 

मोहित बनकर खलहि नचाया।

उसही कर से भस्म कराया॥

 

असुर जलंधर अति बलदाई।

शंकर से उन कीन्ह लडाई॥

 

हार पार शिव सकल बनाई।

कीन सती से छल खल जाई॥


सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी।

बतलाई सब विपत कहानी॥

 

तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी।

वृन्दा की सब सुरति भुलानी॥

 

देखत तीन दनुज शैतानी।

वृन्दा आय तुम्हें लपटानी॥

 

हो स्पर्श धर्म क्षति मानी।

हना असुर उर शिव शैतानी॥

 

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे।

हिरणाकुश आदिक खल मारे॥

 

गणिका और अजामिल तारे।

बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे॥

 

हरहु सकल संताप हमारे।

कृपा करहु हरि सिरजन हारे॥

 

देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे।

दीन बन्धु भक्तन हितकारे॥

 

चहत आपका सेवक दर्शन।

करहु दया अपनी मधुसूदन॥

 

जानूं नहीं योग्य जप पूजन।

होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन॥

 

शीलदया सन्तोष सुलक्षण।

विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण॥

 

करहुं आपका किस विधि पूजन।

कुमति विलोक होत दुख भीषण॥

 

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण।

कौन भांति मैं करहु समर्पण॥


सुर मुनि करत सदा सेवकाई।

हर्षित रहत परम गति पाई॥

 

दीन दुखिन पर सदा सहाई।

निज जन जान लेव अपनाई॥

 

पाप दोष संताप नशाओ।

भव-बंधन से मुक्त कराओ॥

 

सुख संपत्ति दे सुख उपजाओ।

निज चरनन का दास बनाओ॥

 

निगम सदा ये विनय सुनावै।

पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै॥

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श्री ब्रह्मा चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


जय ब्रह्मा जय स्वयम्भू, चतुरानन सुखमूल।


करहु कृपा निज दास पै, रहहु सदा अनुकूल।।


तुम सृजक ब्रह्माण्ड के, अज विधि घाता नाम।


विश्वविधाता कीजिये, जन पै कृपा ललाम।।



🔱चौपाई🔱


जय जय कमलासान जगमूला, रहहू सदा जनपै अनुकूला।


रुप चतुर्भुज परम सुहावन, तुम्हें अहैं चतुर्दिक आनन।


रक्तवर्ण तव सुभग शरीरर, मस्तक जटाजुट गंभीरा।


ताके ऊपर मुकुट बिराजै, दाढ़ी श्वेत महाछवि छाजै।


श्वेतवस्त्र धारे तुम सुन्दर, है यज्ञोपवीत अति मनहर।


कानन कुण्डल सुभग बिराजहिं, गल मोतिन की माला राजहिं।


चारिहु वेद तुम्हीं प्रगटाये, दिव्य ज्ञान त्रिभुवनहिं सिखाये।


ब्रह्मलोक शुभ धाम तुम्हारा, अखिल भुवन महँ यश बिस्तारा।


अर्द्धागिनि तव है सावित्री, अपर नाम हिये गायत्री।


सरस्वती तब सुता मनोहर, वीणा वादिनि सब विधि मुन्दर।


कमलासन पर रहे बिराजे, तुम हरिभक्ति साज सब साजे।


क्षीर सिन्धु सोवत सुरभूपा, नाभि कमल भो प्रगट अनूपा।


तेहि पर तुम आसीन कृपाला, सदा करहु सन्तन प्रतिपाला।


एक बार की कथा प्रचारी, तुम कहँ मोह भयेउ मन भारी।


कमलासन लखि कीन्ह बिचारा, और न कोउ अहै संसारा।


तब तुम कमलनाल गहि लीन्हा, अन्त बिलोकन कर प्रण कीन्हा।


कोटिक वर्ष गये यहि भांती, भ्रमत भ्रमत बीते दिन राती।


पै तुम ताकर अन्त न पाये, ह्वै निराश अतिशय दुःखियाये।


पुनि बिचार मन महँ यह कीन्हा महापघ यह अति प्राचीन।


याको जन्म भयो को कारन, तबहीं मोहि करयो यह धारन।


अखिल भुवन महँ कहँ कोई नाहीं, सब कुछ अहै निहित मो माहीं।


यह निश्चय करि गरब बढ़ायो, निज कहँ ब्रह्म मानि सुखपाये।


गगन गिरा तब भई गंभीरा, ब्रह्मा वचन सुनहु धरि धीरा।


सकल सृष्टि कर स्वामी जोई, ब्रह्म अनादि अलख है सोई।


निज इच्छा इन सब निरमाये, ब्रह्मा विष्णु महेश बनाये।


सृष्टि लागि प्रगटे त्रयदेवा, सब जग इनकी करिहै सेवा।


महापघ जो तुम्हरो आसन, ता पै अहै विष्णु को शासन।


विष्णु नाभितें प्रगट्यो आई, तुम कहँ सत्य दीन्ह समुझाई।


भ्ौटहु जाई विष्णु हितमानी, यह कहि बन्द भई नभवानी।


ताहि श्रवण कहि अचरज माना, पुनि चतुरानन कीन्ह पयाना।


कमल नाल धरि नीचे आवा, तहां विष्णु के दर्शन पावा।


शयन करत देखे सुरभूपा, श्यायमवर्ण तनु परम अनूपा।


सोहत चतुर्भुजा अतिसुन्दर, क्रीटमुकट राजत मस्तक पर। 


गल बैजन्ती माल बिराजै, कोटि सूर्य की शोभा लाजै।


शंख चक्र अरु गदा मनोहर, पघ नाग शय्या अति मनहर।


दिव्यरुप लखि कीन्ह प्रणामू, हर्षित भे श्रीपति सुख धामू।


बहु विधि विनय कीन्ह चतुरानन, तब लक्ष्मी पति कहेउ मुदित मन।


ब्रह्मा दूरि करहु अभिमाना, ब्रह्मारुप हम दोउ समाना।


तीजे श्री शिवशंकर आहीं, ब्रह्मरुप सब त्रिभुवन मांही।


तुम सों होई सृष्टि विस्तारा, हम पालन करिहैं संसारा।


शिव संहार करहिं सब केरा, हम तीनहुं कहँ काज धनेरा।


अगुणरुप श्री ब्रह्मा बखानहु, निराकार तिनकहँ तुम जानहु।


हम साकार रुप त्रयदेवा, करिहैं सदा ब्रह्म की सेवा।


यह सुनि ब्रह्मा परम सिहाये, परब्रह्म के यश अति गाये।


सो सब विदित वेद के नामा, मुक्ति रुप सो परम ललामा।


यहि विधि प्रभु भो जनम तुम्हारा, पुनि तुम प्रगट कीन्ह संसारा।


नाम पितामह सुन्दर पायेउ, जड़ चेतन सब कहँ निरमायेउ।


लीन्ह अनेक बार अवतारा, सुन्दर सुयश जगत विस्तारा।


देवदनुज सब तुम कहँ ध्यावहिं, मनवांछित तुम सन सब पावहिं।


जो कोउ ध्यान धरै नर नारी, ताकी आस पुजावहु सारी।


पुष्कर तीर्थ परम सुखदाई, तहँ तुम बसहु सदा सुरराई।


कुण्ड नहाइ करहि जो पूजन, ता कर दूर होई सब दूषण।



श्री बालाजी चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


श्री गुरु चरण चितलाय के धरें ध्यान हनुमान ।


बालाजी चालीसा लिखे “ओम” स्नेही कल्याण ।।


विश्व विदित वर दानी संकट हरण हनुमान ।


मेंहदीपुर में प्रगट भये बालाजी भगवान ।।



🔱चौपाई🔱


जय हनुमान बालाजी देवा । प्रगट भये यहां तीनों देवा ।।


प्रेतराज भैरव बलवाना । कोलवाल कप्तानी हनुमाना ।।


मेंहदीपुर अवतार लिया है । भक्तों का उद्धार किया है ।।


बालरूप प्रगटे हैं यहां पर । संकट वाले आते जहां पर ।।


डाकिनी शाकिनी अरु जिंदनीं । मशान चुड़ैल भूत भूतनीं ।।


जाके भय ते सब भग जाते । स्याने भोपे यहां घबराते ।।


चौकी बंधन सब कट जाते । दूत मिले आनंद मनाते ।।


सच्चा है दरबार तिहारा । शरण पड़े सुख पावे भारा ।।


रूप तेज बल अतुलित धामा । सन्मुख जिनके सिय रामा ।।


कनक मुकुट मणि तेज प्रकाशा । सबकी होवत पूर्ण आशा ।।


महंत गणेशपुरी गुणीले । भये सुसेवक राम रंगीले ।।


अद्भुत कला दिखाई कैसी । कलयुग ज्योति जलाई जैसी ।।


ऊंची ध्वजा पताका नभ में । स्वर्ण कलश है उन्नत जग में ।।


धर्म सत्य का डंका बाजे । सियाराम जय शंकर राजे ।।


आन फिराया मुगदर घोटा । भूत जिंद पर पड़ते सोटा ।।


राम लक्ष्मन सिय हृदय कल्याणा । बाल रूप प्रगटे हनुमाना ।।


जय हनुमंत हठीले देवा । पुरी परिवार करत है सेवा ।।


लड्डू चूरमा मिसरी मेवा । अर्जी दरखास्त लगाऊ देवा ।।


दया करे सब विधि बालाजी । संकट हरण प्रगटे बालाजी ।।


जय बाबा की जन जन उचारे । कोटिक जन तेरे आए द्वारे ।।


बाल समय रवि भक्षहि लीन्हा । तिमिर मय जग कीन्हो तीन्हा ।।


देवन विनती की अति भारी । छांड़ दियो रवि कष्ट निहारी ।।


लांघि उदधि सिया सुधि लाए । लक्ष्मण हित संजीवन लाए ।।


रामानुज प्राण दिवाकर । शंकर सुवन मां अंजनी चाकर ।।


केसरी नंदन दुख भव भंजन । रामानंद सदा सुख संदन ।।


सिया राम के प्राण पियारे । जय बाबा की भक्त ऊचारे ।।


संकट दुख भंजन भगवाना । दया करहु हे कृपा निधाना ।।


सुमर बाल रूप कल्याणा करे मनोरथ पूर्ण कामा ।।


अष्ट सिद्धि नव निधि दातारी । भक्त जन आवे बहु भारी ।।


मेवा अरु मिष्टान प्रवीना । भेंट चढ़ावें धनि अरु दीना ।।


नृत्य करे नित न्यारे न्यारे । रिद्धि सिद्धियाँ जाके द्वारे ।।


अर्जी का आदर मिलते ही । भैरव भूत पकड़ते तबही ।।


कोतवाल कप्तान कृपाणी । प्रेतराज संकट कल्याणी ।।


चौकी बंधन कटते भाई । जो जन करते हैं सेवकाई ।।


रामदास बाल भगवंता । मेंहदीपुर प्रगटे हनुमंता ।।


जो जन बालाजी में आते । जन्म जन्म के पाप नशाते ।।


जल पावन लेकर घर जाते । निर्मल हो आनंद मनाते ।।


क्रूर कठिन संकट भग जावे । सत्य धर्म पथ राह दिखावें ।।


जो सत पाठ करे चालीसा । तापर प्रसन्न होय बागीसा ।।


कल्याण स्नेही । स्नेह से गावे । सुख समृद्धि रिद्धि सिद्धि पावे ।।

 


⚜️दोहा⚜️


मंद बुद्धि मम जानके, क्षमा करो गुणखान ।


संकट मोचन क्षमहु मम, “ओम” स्नेही कल्याणा ।।



श्री भैरव चालीसा 

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⚜️दोहा⚜️


श्री गणपति गुरु गौरी पद प्रेम सहित धरि माथ।


चालीसा वंदन करो श्री शिव भैरवनाथ॥


श्री भैरव संकट हरण मंगल करण कृपाल।


श्याम वरण विकराल वपु लोचन लाल विशाल॥


🔱चौपाई🔱


जय जय श्री काली के लाला। जयति जयति काशी- कुतवाला॥


जयति बटुक- भैरव भय हारी। जयति काल- भैरव बलकारी॥


जयति नाथ- भैरव विख्याता। जयति सर्व- भैरव सुखदाता॥


भैरव रूप कियो शिव धारण। भव के भार उतारण कारण॥


भैरव रव सुनि हवै भय दूरी। सब विधि होय कामना पूरी॥


शेष महेश आदि गुण गायो। काशी- कोतवाल कहलायो॥


जटा जूट शिर चंद्र विराजत। बाला मुकुट बिजायठ साजत॥


कटि करधनी घुंघरू बाजत। दर्शन करत सकल भय भाजत॥


जीवन दान दास को दीन्ह्यो। कीन्ह्यो कृपा नाथ तब चीन्ह्यो॥


वसि रसना बनि सारद- काली। दीन्ह्यो वर राख्यो मम लाली॥


धन्य धन्य भैरव भय भंजन। जय मनरंजन खल दल भंजन॥


कर त्रिशूल डमरू शुचि कोड़ा। कृपा कटाक्ष सुयश नहिं थोडा॥


जो भैरव निर्भय गुण गावत। अष्टसिद्धि नव निधि फल पावत॥


रूप विशाल कठिन दुख मोचन। क्रोध कराल लाल दुहुं लोचन॥


अगणित भूत प्रेत संग डोलत। बम बम बम शिव बम बम बोलत॥


रुद्रकाय काली के लाला। महा कालहू के हो काला॥


बटुक नाथ हो काल गंभीरा। श्‍वेत रक्त अरु श्याम शरीरा॥


करत नीनहूं रूप प्रकाशा। भरत सुभक्तन कहं शुभ आशा॥


रत्‍न जड़ित कंचन सिंहासन। व्याघ्र चर्म शुचि नर्म सुआनन॥


तुमहि जाइ काशिहिं जन ध्यावहिं। विश्वनाथ कहं दर्शन पावहिं॥


जय प्रभु संहारक सुनन्द जय। जय उन्नत हर उमा नन्द जय॥


भीम त्रिलोचन स्वान साथ जय। वैजनाथ श्री जगतनाथ जय॥


महा भीम भीषण शरीर जय। रुद्र त्रयम्बक धीर वीर जय॥


अश्‍वनाथ जय प्रेतनाथ जय। स्वानारुढ़ सयचंद्र नाथ जय॥


निमिष दिगंबर चक्रनाथ जय। गहत अनाथन नाथ हाथ जय॥


त्रेशलेश भूतेश चंद्र जय। क्रोध वत्स अमरेश नन्द जय॥


श्री वामन नकुलेश चण्ड जय। कृत्याऊ कीरति प्रचण्ड जय॥


रुद्र बटुक क्रोधेश कालधर। चक्र तुण्ड दश पाणिव्याल धर॥


करि मद पान शम्भु गुणगावत। चौंसठ योगिन संग नचावत॥


करत कृपा जन पर बहु ढंगा। काशी कोतवाल अड़बंगा॥


देयं काल भैरव जब सोटा। नसै पाप मोटा से मोटा॥


जनकर निर्मल होय शरीरा। मिटै सकल संकट भव पीरा॥


श्री भैरव भूतों के राजा। बाधा हरत करत शुभ काजा॥


ऐलादी के दुख निवारयो। सदा कृपाकरि काज सम्हारयो॥


सुन्दर दास सहित अनुरागा। श्री दुर्वासा निकट प्रयागा॥


श्री भैरव जी की जय लेख्यो। सकल कामना पूरण देख्यो॥


⚜️दोहा⚜️


जय जय जय भैरव बटुक स्वामी संकट टार।


कृपा दास पर कीजिए शंकर के अवतार॥


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खण्ड 4 :


देव चालीसा संग्रह का पाठ करने से होने वाले लाभ :


देव चालीसा संग्रह का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ हो सकते हैं:


धार्मिक और मानसिक लाभ: इस संग्रह का पाठ करने से आध्यात्मिक और मानसिक लाभ होते हैं। इससे मन शांत होता है और मन में सकारात्मक विचारों का उत्पादन होता है। यह मन को तनाव से मुक्त करता है और उसे शांति देता है।


स्वास्थ्य लाभ: इस संग्रह का पाठ करने से शरीर को संतुलित रखने में मदद मिलती है। इससे रोगों से लड़ने की शक्ति मिलती है और शरीर की कोशिकाओं का विकास होता है।


पारिवारिक लाभ: इस संग्रह का पाठ करने से पारिवारिक संबंधों में मेल जुलाव होता है। यह पारिवारिक समूह को अधिक समृद्ध बनाता है और दुर्घटनाओं और संकटों से बचाता है।


इसके अलावा, देव चालीसा संग्रह के पाठ से धन, समृद्धि, सुख, सम्पत्ति, उत्तरोत्तर प्रतिक्रिया और बढ़ती उमंग की प्राप्ति हो सकती है।


खण्ड 5:


देव चालीसा संग्रह का उद्देश्यात्मक महत्व:


देव चालीसा संग्रह का महत्व अनेक अंशों में होता है।

इसका पाठ धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है।

इसका महत्व निम्नलिखित है:


आध्यात्मिक उद्देश्य: इस संग्रह का पाठ धार्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। यह "भगवान विष्णु, शिव, ब्रह्मा, हनुमान, गणेश, सूर्य, शनि, बालाजी, भैरव, कृष्ण एवं श्री राम" के चालीसा का संग्रह है। इन चालीसाओं का पाठ करने से मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव करता है और अपने आत्मा को शुद्ध करता है।


सामाजिक उद्देश्य: इस संग्रह का पाठ सामाजिक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। इससे समाज की उन्नति होती है और सामाजिक दृष्टिकोण बढ़ता है। इससे मानव समाज में धार्मिकता की भावना जाग्रत होती है और समाज के लोग एक-दूसरे के साथ मेल-जोल बढ़ा सकते हैं।


मानसिक उद्देश्य: इस संग्रह का पाठ मानसिक उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। इससे मन शांत होता है और मन में सकारात्मकता आती है और मानसिक स्थिति सुधरती है। यह मानसिक तनाव को कम करता है और मन को शांति देता है। इससे बुरी आदतों और नकारात्मक विचारों से निपटने में मदद मिलती है। यह मन को स्वस्थ और पूर्णतः तत्पर रखता है जिससे व्यक्ति को अधिक सफलता मिलती है।


इसके अलावा, देव चालीसा संग्रह के पाठ से मन में श्रद्धा का भाव जागृत होता है। यह उन लोगों के लिए भी उपयोगी होता है जो आस्था की कमी महसूस करते हैं। इससे मानसिक रूप से व्यक्ति को स्थायित्व मिलता है और उन्हें अपने जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने में मदद मिलती है।


खण्ड 6:

देव चालीसा संग्रह का अनुसरण एवं वैदिक विधि:


देव चालीसा संग्रह का पाठ करने के लिए निम्न विधि का पालन किया जा सकता है:


सबसे पहले, एक शुद्ध और स्वच्छ स्थान पर बैठें।

अपने मन को शांत करने के लिए, कुछ समय ध्यान केंद्रित करें।

फिर आप देव चालीसा संग्रह की शुरुआत कर सकते हैं।

अपनी अवधि को तय करें और नियमित रूप से पाठ करें।

देव चालीसा संग्रह को स्वर और उच्चारण में सही रीति से पढ़ने का प्रयास करें।

ध्यान दें कि, आप शब्दों को समझें और उनका अर्थ भी समझने का प्रयास करें।


खण्ड 7:


देव चालीसा संग्रह के उच्चारण के नियम:


देव चालीसा संग्रह के उच्चारण के लिए समय का चयन करते समय, आपको इन बातों का ध्यान रखना चाहिए:


सुबह या शाम का समय: देव चालीसा संग्रह का उच्चारण सुबह और शाम के समय ज्यादातर लोगों की प्राथमिकता होती है। इन दोनों समयों में मानसिक शांति और स्थिरता होती है जो आपको उच्चारण के लिए अधिक सक्षम बनाती है।


नियमितता: देव चालीसा संग्रह का उच्चारण नियमितता से किया जाना चाहिए। आप एक निश्चित समय का चयन कर सकते हैं जो आपके रोजमर्रा के कार्यक्रम से मेल खाता हो।


साथी: आप देव चालीसा संग्रह का उच्चारण अकेले भी कर सकते हैं, लेकिन यदि आपके साथ कोई दूसरा व्यक्ति भी हो जो कि इसे उच्चारित करता हो, तो आपका उच्चारण अधिक सकारात्मक और उत्साहजनक होगा।


स्थान: आपको उच्चारण के समय के लिए एक स्थिर स्थान का चयन करना चाहिए जो आरामदायक हो और कोई भी बाधा न हो। इससे आपका उच्चारण अधिक सकारात्मक और सुखद होगा।


देव चालीसा संग्रह | Unique Dev Chalisa Collection @ 🔱 VrandAstrA 🔱



निष्कर्ष:


इस ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से, हमने देव चालीसा संग्रह के बारे में जाना।

इसमें विभिन्न देवों के चालीसा शामिल किए गए हैं, जो हमारे जीवन में खुशहाली और शांति लाते हैं।

तो फिर आइए,

देव चालीसा संग्रह का पाठ करके हम और आप अपनी भक्ति और सामर्थ्य के अनुसार जीवन खुशहाल बनाने का संकल्प लें।


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